देवतालोग तो सत्त्वप्रधान होते हैं। इनमें अपने ऐश्वर्य और पदका अभिमान न होना चाहिये। अतः यह उचित ही है कि इन सत्त्वगुणसे च्युत दुष्ट देवताओंका मैं मान भंग कर दूँ। इससे अन्तमें उन्हें शान्ति ही मिलेगी॥ १७॥✎ 20812082
न हि सद्भावयुक्तानां सुराणामीशविस्मयः।
मत्तोऽसतां मानभंगः प्रशमायोपकल्पते॥ १७
देवतालोग तो सत्त्वप्रधान होते हैं। इनमें अपने ऐश्वर्य और पदका अभिमान न होना चाहिये। अतः यह उचित ही है कि इन सत्त्वगुणसे च्युत दुष्ट देवताओंका मैं मान भंग कर दूँ। इससे अन्तमें उन्हें शान्ति ही मिलेगी॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.25.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 295) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)