श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्‍नाथं मत्परिग्रहम्।

गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः॥ १८

tasmānmaccharaṇaṃ goṣṭhaṃ mannāthaṃ matparigraham|

gopāye svātmayogena so'yaṃ me vrata āhitaḥ|| 18

अर्थ

यह सारा व्रज मेरे आश्रित है, मेरे द्वारा स्वीकृत है और एकमात्र मैं ही इसका रक्षक हूँ। अतः मैं अपनी योगमायासे इसकी रक्षा करूँगा। संतोंकी रक्षा करना तो मेरा व्रत ही है। अब उसके पालनका अवसर आ पहुँचा है’*॥ १८॥✎ 2081 2082

टिप्पणियाँ

  1. *

    भगवान् कहते हैं—

    सकृदेव प्रपन्‍नाय तवास्मीति च       याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम॥

    ‘जो केवल एक बार मेरी शरणमें आ जाता है और ‘मैं तुम्हारा हूँ’ इस प्रकार याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ—यह मेरा व्रत है।’

     

    (मुद्रित पृष्ठ 295)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2081 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2082 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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