श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

तथा निर्विविशुर्गर्तं कृष्णाश्‍वासितमानसाः।

यथावकाशं सधनाः सव्रजाः सोपजीविनः॥ २२

tathā nirviviśurgartaṃ kṛṣṇāśvāsitamānasāḥ|

yathāvakāśaṃ sadhanāḥ savrajāḥ sopajīvinaḥ|| 22

अर्थ

जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सबको आश्‍वासन दिया—ढाढ़स बँधाया, तब सब-के-सब ग्वाल अपने-अपने गोधन, छकड़ों, आश्रितों, पुरोहितों और भृत्योंको अपने-अपने साथ लेकर सुभीतेके अनुसार गोवर्द्धनके गड्ढेमें आ घुसे॥ २२॥

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