देखो, तुमलोग ऐसी शंका न करना कि मेरे हाथसे यह पर्वत गिर पड़ेगा। तुमलोग तनिक भी मत डरो। इस आँधी-पानीके डरसे तुम्हें बचानेके लिये ही मैंने यह युक्ति रची है’॥ २१॥
न त्रास इह वः कार्यो मद्धस्ताद्रिनिपातने।
वातवर्षभयेनालं तत्त्राणं विहितं हि वः॥ २१
देखो, तुमलोग ऐसी शंका न करना कि मेरे हाथसे यह पर्वत गिर पड़ेगा। तुमलोग तनिक भी मत डरो। इस आँधी-पानीके डरसे तुम्हें बचानेके लिये ही मैंने यह युक्ति रची है’॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.25.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 296) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/21/