श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

इन्द्रः सुरर्षिभिः साकं नोदितो देवमातृभिः।

अभ्यषिञ्चत दाशार्हं गोविन्द इति चाभ्यधात्॥ २३

indraḥ surarṣibhiḥ sākaṃ nodito devamātṛbhiḥ|

abhyaṣiñcata dāśārhaṃ govinda iti cābhyadhāt|| 23

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर कामधेनुने अपने दूधसे और देवमाताओंकी प्रेरणासे देवराज इन्द्रने ऐरावतकी सूँडके द्वारा लाये हुए आकाशगंगाके जलसे देवर्षियोंके साथ यदुनाथ श्रीकृष्णका अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’ नामसे सम्बोधित किया॥ २२-२३॥

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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