॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.27.24
तत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयो
गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः ।
जगुर्यशो लोकमलापहं हरेः
सुराङ्गनाः संननृतुर्मुदान्विताः॥ २४
tatrāgatāstumburunāradādayo
gandharvavidyādharasiddhacāraṇāḥ |
jaguryaśo lokamalāpahaṃ hareḥ
surāṅganāḥ saṃnanṛturmudānvitāḥ|| 24
अर्थ
उस समय वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण पहलेसे ही आ गये थे। वे समस्त संसारके पाप-तापको मिटा देनेवाले भगवान्के लोकमलापह यशका गान करने लगे और अप्सराएँ आनन्दसे भरकर नृत्य करने लगीं॥ २४॥