श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.28.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

ते त्वौत्सुक्यधियो राजन् मत्वा गोपास्तमीश्‍वरम्।

अपि नः स्वगतिं सूक्ष्मामुपाधास्यदधीश्‍वरः॥ ११

te tvautsukyadhiyo rājan matvā gopāstamīśvaram|

api naḥ svagatiṃ sūkṣmāmupādhāsyadadhīśvaraḥ|| 11

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌के प्रेमी गोप यह सुनकर ऐसा समझने लगे कि अरे, ये तो स्वयं भगवान् हैं। तब उन्होंने मन-ही-मन बड़ी उत्सुकतासे विचार किया कि क्या कभी जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण हमलोगोंको भी अपना वह मायातीत स्वधाम, जहाँ केवल इनके प्रेमी-भक्त ही जा सकते हैं, दिखलायेंगे॥ ११॥

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