परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं सर्वदर्शी हैं। भला, उनसे यह बात कैसे छिपी रहती? वे अपने आत्मीय गोपोंकी यह अभिलाषा जान गये और उनका संकल्प सिद्ध करनेके लिये कृपासे भरकर इस प्रकार सोचने लगे॥ १२॥
इति स्वानां स भगवान् विज्ञायाखिलदृक् स्वयम्।
संकल्पसिद्धये तेषां कृपयैतदचिन्तयत्॥ १२
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं सर्वदर्शी हैं। भला, उनसे यह बात कैसे छिपी रहती? वे अपने आत्मीय गोपोंकी यह अभिलाषा जान गये और उनका संकल्प सिद्ध करनेके लिये कृपासे भरकर इस प्रकार सोचने लगे॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.28.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 306) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/12/