जब लोकपाल वरुणने देखा कि समस्त जगत्के अन्तरिन्द्रिय और बहिरिन्द्रियोंके प्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही उनके यहाँ पधारे हैं, तब उन्होंने उनकी बहुत बड़ी पूजा की। भगवान्के दर्शनसे उनका रोम-रोम आनन्दसे खिल उठा। इसके बाद उन्होंने भगवान्से निवेदन किया॥ ४॥✎ 886
प्राप्तं वीक्ष्य हृषीकेशं लोकपालः सपर्यया।
महत्या पूजयित्वाऽऽह तद्दर्शनमहोत्सवः॥ ४
जब लोकपाल वरुणने देखा कि समस्त जगत्के अन्तरिन्द्रिय और बहिरिन्द्रियोंके प्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही उनके यहाँ पधारे हैं, तब उन्होंने उनकी बहुत बड़ी पूजा की। भगवान्के दर्शनसे उनका रोम-रोम आनन्दसे खिल उठा। इसके बाद उन्होंने भगवान्से निवेदन किया॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.28.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 305) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/28/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)