श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.28.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

नमस्तुभ्यं भगवते ब्रह्मणे परमात्मने।

न यत्र श्रूयते माया लोकसृष्टिविकल्पना॥ ६

namastubhyaṃ bhagavate brahmaṇe paramātmane|

na yatra śrūyate māyā lokasṛṣṭivikalpanā|| 6

अर्थ

आप भक्तोंके भगवान्, वेदान्तियोंके ब्रह्म और योगियोंके परमात्मा हैं। आपके स्वरूपमें विभिन्‍न लोकसृष्टियोंकी कल्पना करनेवाली माया नहीं है—ऐसा श्रुति कहती है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ६॥

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