श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.28.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अजानता मामकेन मूढेनाकार्यवेदिना।

आनीतोऽयं तव पिता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति॥ ७

ajānatā māmakena mūḍhenākāryavedinā|

ānīto'yaṃ tava pitā tad bhavān kṣantumarhati|| 7

अर्थ

प्रभो! मेरा यह सेवक बड़ा मूढ़ और अनजान है। वह अपने कर्तव्यको भी नहीं जानता। वही आपके पिताजीको ले आया है, आप कृपा करके उसका अपराध क्षमा कीजिये॥ ७॥

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