॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.29.8
ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृबन्धुभिः।
गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्तन्त मोहिताः॥ ८
tā vāryamāṇāḥ patibhiḥ pitṛbhirbhrātṛbandhubhiḥ|
govindāpahṛtātmāno na nyavartanta mohitāḥ|| 8
अर्थ
पिता और पतियोंने, भाई और जाति-बन्धुओंने उन्हें रोका, उनकी मंगलमयी प्रेमयात्रामें विघ्न डाला। परन्तु वे इतनी मोहित हो गयी थीं कि रोकनेपर भी न रुकीं, न रुक सकीं। रुकतीं कैसे? विश्वविमोहन श्रीकृष्णने उनके प्राण, मन और आत्मा सब कुछका अपहरण जो कर लिया था॥ ८॥