श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

लिम्पन्त्यः प्रमृजन्त्योऽन्या अंजन्त्यः काश्‍च लोचने।

व्यत्यस्तवस्त्राभरणाः काश्‍चित् कृष्णान्तिकं ययुः॥ ७

limpantyaḥ pramṛjantyo'nyā aṃjantyaḥ kāśca locane|

vyatyastavastrābharaṇāḥ kāścit kṛṣṇāntikaṃ yayuḥ|| 7

अर्थ

कोई-कोई गोपी अपने शरीरमें अंगराग चन्दन और उबटन लगा रही थीं और कुछ आँखोंमें अंजन लगा रही थीं। वे उन्हें छोड़कर तथा उलटे-पलटे वस्त्र धारणकर श्रीकृष्णके पास पहुँचनेके लिये चल पड़ीं॥ ७॥

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