कोई-कोई गोपी अपने शरीरमें अंगराग चन्दन और उबटन लगा रही थीं और कुछ आँखोंमें अंजन लगा रही थीं। वे उन्हें छोड़कर तथा उलटे-पलटे वस्त्र धारणकर श्रीकृष्णके पास पहुँचनेके लिये चल पड़ीं॥ ७॥
लिम्पन्त्यः प्रमृजन्त्योऽन्या अंजन्त्यः काश्च लोचने।
व्यत्यस्तवस्त्राभरणाः काश्चित् कृष्णान्तिकं ययुः॥ ७
कोई-कोई गोपी अपने शरीरमें अंगराग चन्दन और उबटन लगा रही थीं और कुछ आँखोंमें अंजन लगा रही थीं। वे उन्हें छोड़कर तथा उलटे-पलटे वस्त्र धारणकर श्रीकृष्णके पास पहुँचनेके लिये चल पड़ीं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.29.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 308) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/29/7/