श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथैनमस्तौदवधार्य पूरुषं

परं नताङ्गः कृतधीः कृताञ्जलिः।

स्वरोचिषा भारत सूतिकागृहं

विरोचयन्तं गतभीः प्रभाववित्॥ १२

athainamastaudavadhārya pūruṣaṃ

paraṃ natāṅgaḥ kṛtadhīḥ kṛtāñjaliḥ|

svarociṣā bhārata sūtikāgṛhaṃ

virocayantaṃ gatabhīḥ prabhāvavit|| 12

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण अपनी अंगकान्तिसे सूतिकागृहको जगमग कर रहे थे। जब वसुदेवजीको यह निश्‍चय हो गया कि ये तो परम पुरुष परमात्मा ही हैं, तब भगवान्‌का प्रभाव जान लेनेसे उनका सारा भय जाता रहा। अपनी बुद्धि स्थिर करके उन्होंने भगवान्‌के चरणोंमें अपना सिर झुका दिया और फिर हाथ जोड़कर वे उनकी स्तुति करने लगे—॥ १२॥✎ 2056

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2056 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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