श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

शीर्णपर्णानिलाहारावुपशान्तेन चेतसा।

मत्तः कामानभीप्सन्तौ मदाराधनमीहतुः॥ ३५

śīrṇaparṇānilāhārāvupaśāntena cetasā|

mattaḥ kāmānabhīpsantau madārādhanamīhatuḥ|| 35

अर्थ

तुम दोनों कभी सूखे पत्ते खा लेते और कभी हवा पीकर ही रह जाते। तुम्हारा चित्त बड़ा शान्त था। इस प्रकार तुमलोगोंने मुझसे अभीष्ट वस्तु प्राप्त करनेकी इच्छासे मेरी आराधना की॥ ३५॥

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