तुम दोनों कभी सूखे पत्ते खा लेते और कभी हवा पीकर ही रह जाते। तुम्हारा चित्त बड़ा शान्त था। इस प्रकार तुमलोगोंने मुझसे अभीष्ट वस्तु प्राप्त करनेकी इच्छासे मेरी आराधना की॥ ३५॥
शीर्णपर्णानिलाहारावुपशान्तेन चेतसा।
मत्तः कामानभीप्सन्तौ मदाराधनमीहतुः॥ ३५
तुम दोनों कभी सूखे पत्ते खा लेते और कभी हवा पीकर ही रह जाते। तुम्हारा चित्त बड़ा शान्त था। इस प्रकार तुमलोगोंने मुझसे अभीष्ट वस्तु प्राप्त करनेकी इच्छासे मेरी आराधना की॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.3.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 142) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/3/35/