श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तृतीयेऽस्मिन् भवेऽहं वै तेनैव वपुषाथ वाम्।

जातो भूयस्तयोरेव सत्यं मे व्याहृतं सति॥ ४३

tṛtīye'smin bhave'haṃ vai tenaiva vapuṣātha vām|

jāto bhūyastayoreva satyaṃ me vyāhṛtaṃ sati|| 43

अर्थ

सती देवकी! तुम्हारे इस तीसरे जन्ममें भी मैं उसी रूपसे फिर तुम्हारा पुत्र हुआ हूँ१। मेरी वाणी सर्वदा सत्य होती है॥ ४३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    भगवान् श्रीकृष्णने विचार किया कि मैंने इनको वर तो यह दे दिया कि मेरे सदृश पुत्र होगा, परन्तु इसको मैं पूरा नहीं कर सकता। क्योंकि वैसा कोई है ही नहीं। किसीको कोई वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा करके पूरी न कर सके तो उसके समान तिगुनी वस्तु देनी चाहिये। मेरे सदृश पदार्थके समान मैं ही हूँ। अतएव मैं अपनेको तीन बार इनका पुत्र बनाऊँगा।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 143)

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