श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

मनांस्यासन् प्रसन्‍नानि साधूनामसुरद्रुहाम्।

जायमानेऽजने तस्मिन् नेदुर्दुन्दुभयो दिवि॥ ५

manāṃsyāsan prasannāni sādhūnāmasuradruhām|

jāyamāne'jane tasmin nedurdundubhayo divi|| 5

अर्थ

संत पुरुष पहलेसे ही चाहते थे कि असुरोंकी बढ़ती न होने पाये। अब उनका मन सहसा प्रसन्‍नतासे भर गया। जिस समय भगवान्‌के आविर्भावका अवसर आया, स्वर्गमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं॥ ५॥✎ 1397 2230

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1397 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लगेञ्॥ → लगे॥
  • #2230 टिप्पणी: → १. मेघ समुद्रके पास जाकर मन्द-मन्द गर्जना करते हुए कहते—जलनिधे! यह तुम्हारे उपदेश (पास आने) का फल है कि हमारे पास जल-ही-जल हो गया। अब ऐसा कुछ उपदेश करो कि जैसे तुम्हारे भीतर भगवान् रहते हैं, वैसे हमारे भीतर भी रहें।२. बादल समुद्रके पास जाते और कहते कि समुद्र! तुम्हारे हृदयमें भगवान् रहते हैं, हमें भी उनका दर्शन-प्यार प्राप्त करवा दो। समुद्र उन्हें थोड़ा-सा जल देकर कह देता—अपनी उत्ताल तरंगोंसे ढकेल देता—जाओ अभी विश्‍वकी सेवा करके अन्तःकरण शुद्ध करो, तब भगवान्‌के दर्शन होंगे। स्वयं भगवान् मेघश्याम बनकर समुद्रसे बाहर व्रजमें आ रहे हैं। हम धूपमें उनपर छाया करेंगे, अपनी फुइयाँ बरसाकर जीवन न्योछावर करेंगे और उनकी बाँसुरीके स्वरपर ताल देंगे। अपने इस सौभाग्यका अनुसन्धान करके बादल समुद्रके पास पहुँचे और मन्द-मन्द गर्जना करने लगे। मन्द-मन्द इसलिये कि यह ध्वनि प्यारे श्रीकृष्णके कानोंतक न पहुँच जाय।

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