॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.30.13
पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः।
नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो॥ १३
pṛcchatemā latā bāhūnapyāśliṣṭā vanaspateḥ|
nūnaṃ tatkarajaspṛṣṭā bibhratyutpulakānyaho|| 13
अर्थ
‘अरी सखी! इन लताओंसे पूछो। ये अपने पति वृक्षोंको भुजपाशमें बाँधकर आलिंगन किये हुए हैं, इससे क्या हुआ? इनके शरीरमें जो पुलक है, रोमांच है, वह तो भगवान्के नखोंके स्पर्शसे ही है। अहो! इनका कैसा सौभाग्य है?’॥ १३॥