परीक्षित्! इस प्रकार मतवाली गोपियाँ प्रलाप करती हुई भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो रही थीं। अब और भी गाढ़ आवेश हो जानेके कारण वे भगवन्मय होकर भगवान्की विभिन्न लीलाओंका अनुकरण करने लगीं॥ १४॥✎ 1431
इत्युन्मत्तवचो गोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः।
लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः॥ १४
परीक्षित्! इस प्रकार मतवाली गोपियाँ प्रलाप करती हुई भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो रही थीं। अब और भी गाढ़ आवेश हो जानेके कारण वे भगवन्मय होकर भगवान्की विभिन्न लीलाओंका अनुकरण करने लगीं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 319) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/30/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)