श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज।

दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्‍निधिम्॥ ४०

hā nātha ramaṇa preṣṭha kvāsi kvāsi mahābhuja|

dāsyāste kṛpaṇāyā me sakhe darśaya sannidhim|| 40

अर्थ

‘हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज! तुम कहाँ हो! कहाँ हो!! मेरे सखा! मैं तुम्हारी दीन-हीन दासी हूँ। शीघ्र ही मुझे अपने सान्‍निध्यका अनुभव कराओ, मुझे दर्शन दो’॥ ४०॥

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