परीक्षित्! गोपियाँ भगवान्के चरणचिह्नोंके सहारे उनके जानेका मार्ग ढूँढ़ती-ढूँढ़ती वहाँ जा पहुँची। थोड़ी दूरसे ही उन्होंने देखा कि उनकी सखी अपने प्रियतमके वियोगसे दुःखी होकर अचेत हो गयी है॥ ४१॥
अन्विच्छन्त्यो भगवतो मार्गं गोप्योऽविदूरतः।
ददृशुः प्रियविश्लेषमोहितां दुःखितां सखीम्॥ ४१
परीक्षित्! गोपियाँ भगवान्के चरणचिह्नोंके सहारे उनके जानेका मार्ग ढूँढ़ती-ढूँढ़ती वहाँ जा पहुँची। थोड़ी दूरसे ही उन्होंने देखा कि उनकी सखी अपने प्रियतमके वियोगसे दुःखी होकर अचेत हो गयी है॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 322) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/41/