श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

अन्विच्छन्त्यो भगवतो मार्गं गोप्योऽविदूरतः।

ददृशुः प्रियविश्‍लेषमोहितां दुःखितां सखीम्॥ ४१

anvicchantyo bhagavato mārgaṃ gopyo'vidūrataḥ|

dadṛśuḥ priyaviśleṣamohitāṃ duḥkhitāṃ sakhīm|| 41

अर्थ

परीक्षित्! गोपियाँ भगवान्‌के चरणचिह्नोंके सहारे उनके जानेका मार्ग ढूँढ़ती-ढूँढ़ती वहाँ जा पहुँची। थोड़ी दूरसे ही उन्होंने देखा कि उनकी सखी अपने प्रियतमके वियोगसे दुःखी होकर अचेत हो गयी है॥ ४१॥

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