श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

रहसि संविदं हृच्छयोदयं

प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्।

बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते

मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः॥ १७

rahasi saṃvidaṃ hṛcchayodayaṃ

prahasitānanaṃ premavīkṣaṇam|

bṛhaduraḥ śriyo vīkṣya dhāma te

muhuratispṛhā muhyate manaḥ|| 17

अर्थ

प्यारे! एकान्तमें तुम मिलनकी आकांक्षा, प्रेम-भावको जगानेवाली बातें करते थे। ठिठोली करके हमें छेड़ते थे। तुम प्रेमभरी चितवनसे हमारी ओर देखकर मुसकरा देते थे और हम देखती थीं तुम्हारा वह विशाल वक्षःस्थल, जिसपर लक्ष्मीजी नित्य-निरन्तर निवास करती हैं। तबसे अबतक निरन्तर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन अधिकाधिक मुग्ध होता जा रहा है॥ १७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें