श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते

वृजिनहन्त्र्यलं विश्‍वमङ्गलम्।✎ 2087

त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां

स्वजनहृद्रुजां यन्‍निषूदनम्॥ १८

vrajavanaukasāṃ vyaktiraṅga te

vṛjinahantryalaṃ viśvamaṅgalam|

tyaja manāk ca nastvatspṛhātmanāṃ

svajanahṛdrujāṃ yanniṣūdanam|| 18

अर्थ

प्यारे! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियोंके सम्पूर्ण दुःख-तापको नष्ट करनेवाली और विश्‍वका पूर्ण मंगल करनेके लिये है। हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसासे भर रहा है। कुछ थोड़ी-सी ऐसी ओषधि दो, जो तुम्हारे निजजनोंके हृदयरोगको सर्वथा निर्मूल कर दे॥ १८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2087 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): हन्त्रॺलं वि → हन्त्र्यलं वि

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