न तत्र सौहृदं धर्मः स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा॥ १७
mitho bhajanti ye sakhyaḥ svārthaikāntodyamā hi te|
na tatra sauhṛdaṃ dharmaḥ svārthārthaṃ taddhi nānyathā|| 17
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—मेरी प्रिय सखियो! जो प्रेम करनेपर प्रेम करते हैं, उनका तो सारा उद्योग स्वार्थको लेकर है। लेन-देनमात्र है। न तो उनमें सौहार्द है और न तो धर्म। उनका प्रेम केवल स्वार्थके लिये ही है; इसके अतिरिक्त उनका और कोई प्रयोजन नहीं है॥ १७॥✎ 16682089
मिथो भजन्ति ये सख्यः स्वार्थैकान्तोद्यमा हि ते।
न तत्र सौहृदं धर्मः स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा॥ १७
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—मेरी प्रिय सखियो! जो प्रेम करनेपर प्रेम करते हैं, उनका तो सारा उद्योग स्वार्थको लेकर है। लेन-देनमात्र है। न तो उनमें सौहार्द है और न तो धर्म। उनका प्रेम केवल स्वार्थके लिये ही है; इसके अतिरिक्त उनका और कोई प्रयोजन नहीं है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.32.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 330) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/32/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)