dharmo nirapavādo'tra sauhṛdaṃ ca sumadhyamāḥ|| 18
अर्थ
सुन्दरियो! जो लोग प्रेम न करनेवालेसे भी प्रेम करते हैं—जैसे स्वभावसे ही करुणाशील सज्जन और माता-पिता—उनका हृदय सौहार्दसे, हितैषितासे भरा रहता है और सच पूछो, तो उनके व्यवहारमें निश्छल सत्य एवं पूर्ण धर्म भी है॥ १८॥✎ 16682089
भजन्त्यभजतो ये वै करुणाः पितरो यथा।
धर्मो निरपवादोऽत्र सौहृदं च सुमध्यमाः॥ १८
सुन्दरियो! जो लोग प्रेम न करनेवालेसे भी प्रेम करते हैं—जैसे स्वभावसे ही करुणाशील सज्जन और माता-पिता—उनका हृदय सौहार्दसे, हितैषितासे भरा रहता है और सच पूछो, तो उनके व्यवहारमें निश्छल सत्य एवं पूर्ण धर्म भी है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.32.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 330) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/32/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)