श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

कस्याश्‍चिन्‍नाट्यविक्षिप्तकुण्डलत्विषमण्डितम् ।

गण्डं गण्डे सन्दधत्या अदात्ताम्बूलचर्वितम्॥ १३

kasyāścinnāṭyavikṣiptakuṇḍalatviṣamaṇḍitam |

gaṇḍaṃ gaṇḍe sandadhatyā adāttāmbūlacarvitam|| 13

अर्थ

एक गोपी नृत्य कर रही थी। नाचनेके कारण उसके कुण्डल हिल रहे थे, उनकी छटासे उसके कपोल और भी चमक रहे थे। उसने अपने कपोलोंको भगवान् श्रीकृष्णके कपोलसे सटा दिया और भगवान्‌ने उसके मुँहमें अपना चबाया हुआ पान दे दिया॥ १३॥✎ 2090

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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