श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

नृत्यन्ती गायती काचित् कूजन्‍नूपुरमेखला।

पार्श्‍वस्थाच्युतहस्ताब्जं श्रान्ताधात् स्तनयोः शिवम्॥ १४

nṛtyantī gāyatī kācit kūjannūpuramekhalā|

pārśvasthācyutahastābjaṃ śrāntādhāt stanayoḥ śivam|| 14

अर्थ

कोई गोपी नूपुर और करधनीके घुँघरुओंको झनकारती हुई नाच और गा रही थी। वह जब बहुत थक गयी, तब उसने अपने बगलमें ही खड़े श्यामसुन्दरके शीतल करकमलको अपने दोनों स्तनोंपर रख लिया॥ १४॥✎ 2090

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