श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

गोप्यो लब्ध्वाच्युतं कान्तं श्रिय एकान्तवल्लभम्।

गृहीतकण्ठ्यस्तद्दोर्भ्यां गायन्त्यस्तं विजह्रिरे॥ १५

gopyo labdhvācyutaṃ kāntaṃ śriya ekāntavallabham|

gṛhītakaṇṭhyastaddorbhyāṃ gāyantyastaṃ vijahrire|| 15

अर्थ

परीक्षित्! गोपियोंका सौभाग्य लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है। लक्ष्मीजीके परम प्रियतम एकान्तवल्लभ भगवान् श्रीकृष्णको अपने परम प्रियतमके रूपमें पाकर गोपियाँ गान करती हुई उनके साथ विहार करने लगीं। भगवान् श्रीकृष्णने उनके गलोंको अपने भुजपाशमें बाँध रखा था, उस समय गोपियोंकी बड़ी अपूर्व शोभा थी॥ १५॥✎ 1669

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1669 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: झिल-मिला → झिलमिला

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