उनके कानोंमें कमलके कुण्डल शोभायमान थे। घुँघराली अलकें कपोलोंपर लटक रही थीं। पसीनेकी बूँदें झलकनेसे उनके मुखकी छटा निराली ही हो गयी थी। वे रासमण्डलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ नृत्य कर रही थीं। उनके कंगन और पायजेबोंके बाजे बज रहे थे। भौंरे उनके ताल-सुरमें अपना सुर मिलाकर गा रहे थे। और उनके जूड़ों तथा चोटियोंमें गुँथे हुए फूल गिरते जा रहे थे॥ १६॥✎ 1669
कर्णोत्पलालकविटंककपोलघर्म-
वक्त्रश्रियो वलयनूपुरघोषवाद्यैः।
गोप्यः समं भगवता ननृतुः स्वकेश-
स्रस्तस्रजो भ्रमरगायकरासगोष्ठ्याम्॥ १६
उनके कानोंमें कमलके कुण्डल शोभायमान थे। घुँघराली अलकें कपोलोंपर लटक रही थीं। पसीनेकी बूँदें झलकनेसे उनके मुखकी छटा निराली ही हो गयी थी। वे रासमण्डलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ नृत्य कर रही थीं। उनके कंगन और पायजेबोंके बाजे बज रहे थे। भौंरे उनके ताल-सुरमें अपना सुर मिलाकर गा रहे थे। और उनके जूड़ों तथा चोटियोंमें गुँथे हुए फूल गिरते जा रहे थे॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.33.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 333) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)