श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

एवं परिष्वङ्गकराभिमर्श-

स्निग्धेक्षणोद्दामविलासहासैः ।

रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभि-

र्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः॥ १७

evaṃ pariṣvaṅgakarābhimarśa-

snigdhekṣaṇoddāmavilāsahāsaiḥ |

reme rameśo vrajasundarībhi-

ryathārbhakaḥ svapratibimbavibhramaḥ|| 17

अर्थ

परीक्षित्! जैसे नन्हा-सा शिशु निर्विकारभावसे अपनी परछाईंके साथ खेलता है, वैसे ही रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण कभी उन्हें अपने हृदयसे लगा लेते, कभी हाथसे उनका अंगस्पर्श करते, कभी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे उनकी ओर देखते तो कभी लीलासे उन्मुक्त हँसी हँसने लगते। इस प्रकार उन्होंने व्रजसुन्दरियोंके साथ क्रीडा की, विहार किया॥ १७॥✎ 1669

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1669 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: झिल-मिला → झिलमिला

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