श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्‍वरः।

विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथारुद्रोऽब्धिजं विषम्॥ ३१

naitat samācarejjātu manasāpi hyanīśvaraḥ|

vinaśyatyācaran mauḍhyādyathārudro'bdhijaṃ viṣam|| 31

अर्थ

जिन लोगोंमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है, उन्हें मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ऐसा काम कर बैठे, तो उसका नाश हो जाता है। भगवान् शंकरने हलाहल विष पी लिया था, दूसरा कोई पिये तो वह जलकर भस्म हो जायगा॥ ३१॥

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