tau kalpayantau yugapat svaramaṇḍalamūrcchitam|| 23
अर्थ
अभी-अभी सायंकाल हुआ था। आकाशमें तारे उग आये थे और चाँदनी छिटक रही थी। बेलाके सुन्दर गन्धसे मतवाले होकर भौंरे इधर-उधर गुनगुना रहे थे तथा जलाशयमें खिली हुई कुमुदिनीकी सुगन्ध लेकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी। उस समय उनका सम्मान करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने एक ही साथ मिलकर राग अलापा। उनका राग आरोह-अवरोह स्वरोंके चढ़ाव-उतारसे बहुत ही सुन्दर लग रहा था। वह जगत्के समस्त प्राणियोंके मन और कानोंको आनन्दसे भर देनेवाला था॥ २२-२३॥
यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
जगतुः सर्वभूतानां मनःश्रवणमङ्गलम्।
तौ कल्पयन्तौ युगपत् स्वरमण्डलमूर्च्छितम्॥ २३
अभी-अभी सायंकाल हुआ था। आकाशमें तारे उग आये थे और चाँदनी छिटक रही थी। बेलाके सुन्दर गन्धसे मतवाले होकर भौंरे इधर-उधर गुनगुना रहे थे तथा जलाशयमें खिली हुई कुमुदिनीकी सुगन्ध लेकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी। उस समय उनका सम्मान करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने एक ही साथ मिलकर राग अलापा। उनका राग आरोह-अवरोह स्वरोंके चढ़ाव-उतारसे बहुत ही सुन्दर लग रहा था। वह जगत्के समस्त प्राणियोंके मन और कानोंको आनन्दसे भर देनेवाला था॥ २२-२३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 349) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/34/23/