उनका वह गान सुनकर गोपियाँ मोहित हो गयीं। परीक्षित्! उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही कि वे उसपरसे खिसकते हुए वस्त्रों और चोटियोंसे बिखरते हुए पुष्पोंको सँभाल सकें॥ २४॥
गोप्यस्तद्गीतमाकर्ण्य मूर्च्छिता नाविदन् नृप।
स्रंसद्दुकूलमात्मानं स्रस्तकेशस्रजं ततः॥ २४
उनका वह गान सुनकर गोपियाँ मोहित हो गयीं। परीक्षित्! उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही कि वे उसपरसे खिसकते हुए वस्त्रों और चोटियोंसे बिखरते हुए पुष्पोंको सँभाल सकें॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 349) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/34/24/