उस दिन परम भाग्यवान् नन्द-सुनन्द आदि गोपोंने उपवास कर रखा था, इसलिये वे लोग केवल जल पीकर रातके समय सरस्वती नदीके तटपर ही बेखटके सो गये॥ ४॥✎ 2091
ऊषुः सरस्वतीतीरे जलं प्राश्य धृतव्रताः।
रजनीं तां महाभागा नन्दसुनन्दकादयः॥ ४
उस दिन परम भाग्यवान् नन्द-सुनन्द आदि गोपोंने उपवास कर रखा था, इसलिये वे लोग केवल जल पीकर रातके समय सरस्वती नदीके तटपर ही बेखटके सो गये॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 347) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/34/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)