श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

कश्‍चिन्महानहिस्तस्मिन् विपिनेऽतिबुभुक्षितः।

यदृच्छयाऽऽगतो नन्दं शयानमुरगोऽग्रसीत्॥ ५

kaścinmahānahistasmin vipine'tibubhukṣitaḥ|

yadṛcchayā''gato nandaṃ śayānamurago'grasīt|| 5

अर्थ

उस अम्बिकावनमें एक बड़ा भारी अजगर रहता था। उस दिन वह भूखा भी बहुत था। दैववश वह उधर ही आ निकला और उसने सोये हुए नन्दजीको पकड़ लिया॥ ५॥✎ 1670 2092

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1670 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सर्वांग-सुन्दर → सर्वांगसुन्दर
  • #2092 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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