उस अम्बिकावनमें एक बड़ा भारी अजगर रहता था। उस दिन वह भूखा भी बहुत था। दैववश वह उधर ही आ निकला और उसने सोये हुए नन्दजीको पकड़ लिया॥ ५॥✎ 16702092
कश्चिन्महानहिस्तस्मिन् विपिनेऽतिबुभुक्षितः।
यदृच्छयाऽऽगतो नन्दं शयानमुरगोऽग्रसीत्॥ ५
उस अम्बिकावनमें एक बड़ा भारी अजगर रहता था। उस दिन वह भूखा भी बहुत था। दैववश वह उधर ही आ निकला और उसने सोये हुए नन्दजीको पकड़ लिया॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 347) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/34/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)