श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

एवं ककुद्मिनं हत्वा स्तूयमानः स्वजातिभिः।

विवेश गोष्ठं सबलो गोपीनां नयनोत्सवः॥ १५

evaṃ kakudminaṃ hatvā stūyamānaḥ svajātibhiḥ|

viveśa goṣṭhaṃ sabalo gopīnāṃ nayanotsavaḥ|| 15

अर्थ

जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार बैलके रूपमें आने-वाले अरिष्टासुरको मार डाला, तब सभी गोप उनकी प्रशंसा करने लगे। उन्होंने बलरामजीके साथ गोष्ठमें प्रवेश किया और उन्हें देख-देखकर गोपियोंके नयन-मन आनन्दसे भर गये॥ १५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें