परीक्षित्! इस प्रकार वह दैत्य मुँहसे खून उगलता और गोबर-मूत करता हुआ पैर पटकने लगा। उसकी आँखें उलट गयीं और उसने बड़े कष्टके साथ प्राण छोड़े। अब देवतालोग भगवान्पर फूल बरसा-बरसाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ १४॥
असृग् वमन् मूत्रशकृत् समुत्सृजन्
क्षिपंश्च पादाननवस्थितेक्षणः।
जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं
पुष्पैः किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४
परीक्षित्! इस प्रकार वह दैत्य मुँहसे खून उगलता और गोबर-मूत करता हुआ पैर पटकने लगा। उसकी आँखें उलट गयीं और उसने बड़े कष्टके साथ प्राण छोड़े। अब देवतालोग भगवान्पर फूल बरसा-बरसाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.36.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 358) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/36/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1161 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तेरथ → निऋर्ऋतेरथ
#1162 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतेरथ → निर्ऋतेरथ
#2174 छूटा या अधिक पाठ: जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं पुष्पैः / किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४ → जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं / पुष्पैः किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४