श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

भो भो दानपते मह्यं क्रियतां मैत्रमादृतः।

नान्यस्त्वत्तो हिततमो विद्यते भोजवृष्णिषु॥ २८

bho bho dānapate mahyaṃ kriyatāṃ maitramādṛtaḥ|

nānyastvatto hitatamo vidyate bhojavṛṣṇiṣu|| 28

अर्थ

‘अक्रूरजी! आप तो बड़े उदार दानी हैं। सब तरहसे मेरे आदरणीय हैं। आज आप मेरा एक मित्रोचित काम कर दीजिये; क्योंकि भोजवंशी और वृष्णिवंशी यादवोंमें आपसे बढ़कर मेरी भलाई करनेवाला दूसरा कोई नहीं है॥ २८॥

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