श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

इत्याज्ञाप्यार्थतन्त्रज्ञ आहूय यदुपुङ्गवम्।

गृहीत्वा पाणिना पाणिं ततोऽक्रूरमुवाच ह॥ २७

ityājñāpyārthatantrajña āhūya yadupuṅgavam|

gṛhītvā pāṇinā pāṇiṃ tato'krūramuvāca ha|| 27

अर्थ

परीक्षित्! कंस तो केवल स्वार्थ-साधनका सिद्धान्त जानता था। इसलिये उसने मन्त्री, पहलवान और महावतको इस प्रकार आज्ञा देकर श्रेष्ठ यदुवंशी अक्रूरको बुलवाया और उनका हाथ अपने हाथमें लेकर बोला—॥ २७॥

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