प्रभो! आप सबके अधिष्ठान और स्वयं अधिष्ठानरहित हैं। आपने सृष्टिके प्रारम्भमें अपनी मायासे ही गुणोंकी सृष्टि की और उन गुणोंको ही स्वीकार करके आप जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय करते रहते हैं। यह सब करनेके लिये आपको अपनेसे अतिरिक्त और किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि आप सर्वशक्तिमान् और सत्यसङ्कल्प हैं॥ १३॥✎ 192120932094
आत्मनाऽऽत्माश्रयः पूर्वं मायया ससृजे गुणान्।
तैरिदं सत्यसंकल्पः सृजस्यत्स्यवसीश्वरः॥ १३
प्रभो! आप सबके अधिष्ठान और स्वयं अधिष्ठानरहित हैं। आपने सृष्टिके प्रारम्भमें अपनी मायासे ही गुणोंकी सृष्टि की और उन गुणोंको ही स्वीकार करके आप जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय करते रहते हैं। यह सब करनेके लिये आपको अपनेसे अतिरिक्त और किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि आप सर्वशक्तिमान् और सत्यसङ्कल्प हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.37.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 363) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/37/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1921 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदुवंश-शिरोमणि → यदुवंशशिरोमणि