श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

त्वमात्मा सर्वभूतानामेको ज्योतिरिवैधसाम्।

गूढो गुहाशयः साक्षी महापुरुष ईश्‍वरः॥ १२

tvamātmā sarvabhūtānāmeko jyotirivaidhasām|

gūḍho guhāśayaḥ sākṣī mahāpuruṣa īśvaraḥ|| 12

अर्थ

जैसे एक ही अग्‍नि सभी लकड़ियोंमें व्याप्त रहती है, वैसे एक ही आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं। आत्माके रूपमें होनेपर भी आप अपनेको छिपाये रखते हैं; क्योंकि आप पंचकोशरूप गुफाओंके भीतर रहते हैं। फिर भी पुरुषोत्तमके रूपमें, सबके नियन्ताके रूपमें और सबके साक्षीके रूपमें आपका अनुभव होता ही है॥ १२॥✎ 1921 2093 2094

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1921 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदुवंश-शिरोमणि → यदुवंशशिरोमणि
  • #2093 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2094 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डे़ → ड़े

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