श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

दिष्ट्या ते निहतो दैत्यो लीलयायं हयाकृतिः।

यस्य हेषितसंत्रस्तास्त्यजन्त्यनिमिषा दिवम्॥ १५

diṣṭyā te nihato daityo līlayāyaṃ hayākṛtiḥ|

yasya heṣitasaṃtrastāstyajantyanimiṣā divam|| 15

अर्थ

यह बड़े आनन्दकी बात है कि आपने खेल-ही-खेलमें घोड़ेके रूपमें रहनेवाले इस केशी दैत्यको मार डाला। इसकी हिनहिनाहटसे डरकर देवतालोग अपना स्वर्ग छोड़कर भाग जाया करते थे॥ १५॥✎ 1921 2093 2094

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1921 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदुवंश-शिरोमणि → यदुवंशशिरोमणि
  • #2093 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2094 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डे़ → ड़े

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