श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

चाणूरं मुष्टिकं चैव मल्लानन्यांश्‍च हस्तिनम्।

कंसं च निहतं द्रक्ष्ये परश्‍वोऽहनि ते विभो॥ १६

cāṇūraṃ muṣṭikaṃ caiva mallānanyāṃśca hastinam|

kaṃsaṃ ca nihataṃ drakṣye paraśvo'hani te vibho|| 16

अर्थ

प्रभो! अब परसों मैं आपके हाथों चाणूर, मुष्टिक, दूसरे पहलवान, कुवलयापीड हाथी और स्वयं कंसको भी मरते देखूँगा॥ १६॥

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