श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

उद्वाहं वीरकन्यानां वीर्यशुल्कादिलक्षणम्।

नृगस्य मोक्षणं पापाद् द्वारकायां जगत्पते॥ १८

udvāhaṃ vīrakanyānāṃ vīryaśulkādilakṣaṇam|

nṛgasya mokṣaṇaṃ pāpād dvārakāyāṃ jagatpate|| 18

अर्थ

आप अपनी कृपा, वीरता, सौन्दर्य आदिका शुल्क देकर वीर-कन्याओंसे विवाह करेंगे, और जगदीश्‍वर! आप द्वारकामें रहते हुए नृगको पापसे छुड़ायेंगे॥ १८॥

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