श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

तत्रासन् कतिचिच्चोराः पालाश्‍च कतिचिन्‍नृप।

मेषायिताश्‍च तत्रैके विजह्रुरकुतोभयाः॥ २८✎ 1164

tatrāsan katiciccorāḥ pālāśca katicinnṛpa|

meṣāyitāśca tatraike vijahrurakutobhayāḥ|| 28

अर्थ

राजन्! उन लोगोंमेंसे कुछ तो चोर और कुछ रक्षक तथा कुछ भेड़ बन गये थे। इस प्रकार वे निर्भय होकर खेलमें रम गये थे॥ २८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1164 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विजहृरकुतोभया:॥ → विजह्रुरकुतोभयाः॥

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