राजन्! उन लोगोंमेंसे कुछ तो चोर और कुछ रक्षक तथा कुछ भेड़ बन गये थे। इस प्रकार वे निर्भय होकर खेलमें रम गये थे॥ २८॥
तत्रासन् कतिचिच्चोराः पालाश्च कतिचिन्नृप।
मेषायिताश्च तत्रैके विजह्रुरकुतोभयाः॥ २८
राजन्! उन लोगोंमेंसे कुछ तो चोर और कुछ रक्षक तथा कुछ भेड़ बन गये थे। इस प्रकार वे निर्भय होकर खेलमें रम गये थे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.37.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 365) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/37/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1164 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विजहृरकुतोभया:॥ → विजह्रुरकुतोभयाः॥