श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

मयपुत्रो महामायो व्योमो गोपालवेषधृक्।

मेषायितानपोवाह प्रायश्‍चोरायितो बहून्॥ २९

mayaputro mahāmāyo vyomo gopālaveṣadhṛk|

meṣāyitānapovāha prāyaścorāyito bahūn|| 29

अर्थ

उसी समय ग्वालका वेष धारण करके व्योमासुर वहाँ आया। वह मायावियोंके आचार्य मयासुरका पुत्र था और स्वयं भी बड़ा मायावी था। वह खेलमें बहुधा चोर ही बनता और भेड़ बने हुए बहुत-से बालकोंको चुराकर छिपा आता॥ २९॥

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