श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

गिरिदर्यां विनिक्षिप्य नीतं नीतं महासुरः।

शिलया पिदधे द्वारं चतुःपंचावशेषिताः॥ ३०

giridaryāṃ vinikṣipya nītaṃ nītaṃ mahāsuraḥ|

śilayā pidadhe dvāraṃ catuḥpaṃcāvaśeṣitāḥ|| 30

अर्थ

वह महान् असुर बार-बार उन्हें ले जाकर एक पहाड़की गुफामें डाल देता और उसका दरवाजा एक बड़ी चट्टानसे ढक देता। इस प्रकार ग्वालबालोंमें केवल चार-पाँच बालक ही बच रहे॥ ३०॥

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