॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.38.21
लब्धांगसंगं प्रणतं कृतांजलिं
मां वक्ष्यतेऽक्रूर ततेत्युरुश्रवाः।
तदा वयं जन्मभृतो महीयसा
नैवादृतो यो धिगमुष्य जन्म तत्॥ २१
labdhāṃgasaṃgaṃ praṇataṃ kṛtāṃjaliṃ
māṃ vakṣyate'krūra tatetyuruśravāḥ|
tadā vayaṃ janmabhṛto mahīyasā
naivādṛto yo dhigamuṣya janma tat|| 21
अर्थ
जब वे मेरा आलिंगन कर चुकेंगे और मैं हाथ जोड़, सिर झुकाकर उनके सामने खड़ा हो जाऊँगा तब वे मुझे ‘चाचा अक्रूर!’ इस प्रकार कहकर सम्बोधन करेंगे! क्यों न हो, इसी पवित्र और मधुर यशका विस्तार करनेके लिये ही तो वे लीला कर रहे हैं। तब मेरा जीवन सफल हो जायगा। भगवान् श्रीकृष्णने जिसको अपनाया नहीं, जिसे आदर नहीं दिया—उसके उस जन्मको, जीवनको धिक्कार है॥ २१॥