श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

न तस्य कश्‍चिद् दयितः सुहृत्तमो

न चाप्रियो द्वेष्य उपेक्ष्य एव वा।

तथापि भक्तान् भजते यथा तथा

सुरद्रुमो यद्वदुपाश्रितोऽर्थदः॥ २२

na tasya kaścid dayitaḥ suhṛttamo

na cāpriyo dveṣya upekṣya eva vā|

tathāpi bhaktān bhajate yathā tathā

suradrumo yadvadupāśrito'rthadaḥ|| 22

अर्थ

न तो उन्हें कोई प्रिय है और न तो अप्रिय। न तो उनका कोई आत्मीय सुहृद् है और न तो शत्रु। उनकी उपेक्षाका पात्र भी कोई नहीं है। फिर भी जैसे कल्पवृक्ष अपने निकट आकर याचना करनेवालोंको उनकी मुँहमाँगी वस्तु देता है, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण भी, जो उन्हें जिस प्रकार भजता है, उसे उसी रूपमें भजते हैं—वे अपने प्रेमी भक्तोंसे ही पूर्ण प्रेम करते हैं॥ २२॥

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