श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

किंचाग्रजो मावनतं यदूत्तमः

स्मयन् परिष्वज्य गृहीतमंजलौ।

गृहं प्रवेश्याप्तसमस्तसत्कृतं

संप्रक्ष्यते कंसकृतं स्वबन्धुषु॥ २३

kiṃcāgrajo māvanataṃ yadūttamaḥ

smayan pariṣvajya gṛhītamaṃjalau|

gṛhaṃ praveśyāptasamastasatkṛtaṃ

saṃprakṣyate kaṃsakṛtaṃ svabandhuṣu|| 23

अर्थ

मैं उनके सामने विनीत भावसे सिर झुकाकर खड़ा हो जाऊँगा और बलरामजी मुसकराते हुए मुझे अपने हृदयसे लगा लेंगे और फिर मेरे दोनों हाथ पकड़कर मुझे घरके भीतर ले जायँगे। वहाँ सब प्रकारसे मेरा सत्कार करेंगे। इसके बाद मुझसे पूछेंगे कि ‘कंस हमारे घरवालोंके साथ कैसा व्यवहार करता है?’॥ २३॥

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